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ममता बनर्जी के राष्ट्रीय नेतृत्व पर सवाल

Posted On: 27 Nov, 2016 में

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अनवर हुसैन, कोलकाता: तृणमूल प्रमुख व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भाजपा की सांप्रदायिक व जनविरोधी नीतियों के विरुद्ध लोकतांत्रिक व धर्मनिरपेक्ष दलों को एकजुट होकर लड़ाई करने की अपील ही नहीं की थी बल्कि उन्हें एक मंच पर लाने का प्रयास भी किया था। इसी कड़ी में उन्हें नोटबंदी का भी एक ज्वलंत मुद्दा हाथ लगाया जिसके विरोध में वह सडक़ पर उतर गईं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर 2016 को 1000 और 500 के पुराने नोटों को चलन से बाहर करने का फैसला किया और 30 दिसंबर 2016 तक ऐसे नोटों को बैंकों में वापस कर देने का निर्देश दिया। ममता प्रधानमंत्री के इस निर्णय के विरोध में खड़ी हो गईं। इस मुद्दे पर भी वह कांग्रेस, जद(यू), समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी(आप) समेत अन्य दलों के नेताओं को भाजपा के विरुद्ध एकत्र करने में जुट गईं। पहले मुद्दे पर उन्हें जरूर कुछ दलों का समर्थन मिला लेकिन दूसरे मुद्दे पर उन्हें जिससे समर्थन मिलने की उम्मीद थी उससे नहीं मिली। यानी कांग्रेस और माकपा ने नोट बंदी के मुद्दे पर ममता के साथ साझा आंदोलन करने से इनकार कर दिया। हालांकि दोनों पार्टियां इस मुद्दे पर मोदी सरकार का विरोध कर रही हैं। राष्ट्रीय स्तर पर ममता को इन दोनों दलों का साथ नहीं मिला तो इसके मूल में राज्य की राजनीति है।
पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर चौधरी व्यक्तिगत तौर पर ममता के घोर विरोधी हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कह दिया है कि नोट बंदी के मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस के साथ साझा आंदोलन करने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता है। जिस तृणमूल कांग्रेस के अधिकांश नेता सारधा चिटफंड घोटाला और नारद स्टिंग कांड में फंसे हैं उनके साथ कांग्रेस कभी संयुक्त आंदोलन नहीं कर सकती। इसी तरह माकपा राज्य सचिव सूर्यकांत मिश्रा भी व्यक्तिगत तौर पर ममता के कïट्टर विरोधी हैं। विपक्ष के नेता रहने के दौरान तो मिश्रा ने हमेशा ममता से दूरियां बनाए रखी। राज्य में तृणमूल कांग्रेस से मुकाबला करने के लिए मिश्रा ने पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की सहमति के बिना ही कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लिया। नोटबंदी के मुद्दे पर मिश्रा ने भी ममता की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के साथ किसी भी आंदोलन में जाने से इनकार कर दिया है। उन्होंने यहां तक कहा है कि जिस तृणमूल कांग्रेस के नेता सारधा टिटफंड घोटाले में जेल जा चुके हैं उस पार्टी की नेता के मुंह से इस मुद्दे पर विरोध करना शोभा नहीं देता है। कांग्रेस और माकपा के राज्य नेताओं से सहयोग नहीं मिलने के कारण ही ममता ने दोनों दलों के केंद्रीय नेताओं से बातचीत की। ममता ने माकपा महासचिव सीताराम येचुरी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से भी नोटबंदी के विरोध में साझा आंदोलन शुरू करने के लिए बात की। लेकिन राज्य नेतृत्व को नाराज कर माकपा और कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने भी ममता के साथ साझा आंदोलन करने से इनकार कर दिया।
दूसरी ओर ममता की राजनीतिक गतिविधियों से यह आभास मिल रहा है कि वह राष्ट्रीय राजनीति में अहम भूमिका निभाने को लेकर उतावली हैं। उन्होंने अपने सभी राजनीतिक मित्रों से एकजुट होकर भाजपा के विरुद्ध लडऩे की अपील की है और नोटबंदी के मुद्दे पर वह कुछ दलों को साथ लेकर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी से भी मिली हैं। ममता दिल्ली में जब राष्ट्रपति से मिलने गईं तो उनके साथ मात्र आम आदमी पार्टी(आप) और शिवसेना के प्रतिनिधि ही राष्ट्रपति भवन गए जिनका लोकसभा में कोई खास जनाधार नहीं है। ममता ने नोटबंदी के विरोध में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के साथ वहां सभा भी की। इसके बावजूद उन्हें अधिकांश विपक्षी दलों का समर्थन नहीं मिला।
केंद्र की यूपीए-2 सरकार के समय राष्ट्रपति के चुनाव में ममता दिल्ली गई थी और सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के साथ मिलकर राजनीतिक तालमेल बनाने का प्रयास किया था। राष्ट्रपति चुनाव में प्रणव मुखर्जी यूपीए के उम्मीदवार थे। ममता ने राष्ट्रपति चुनाव में मुलायम के साथ मिलकर प्रणव मुखर्जी की उम्मीदवारी का विरोध किया था। लेकिन मुलायम ने रातोरात पाला बदल दिया और ममता की राष्ट्रीय राजनीति में अहम भूमिका निभाने की लालसा पर पानी फिर गया। अंतत: राजनीतिक दबाव में ममता को भी राष्ट्रपति चुनाव में प्रणव मुखर्जी का समर्थन करना पड़ा। एक बार झटका लगने के बावजूद वह फिर राष्ट्रीय राजनीति में पैठ बनाने को लेकर सक्रिय हुई हैं। लेकिन सवाल यहां नेतृत्व की स्वीकार्यता का है। पश्चिम बंगाल में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टी माकपा किसी भी हाल में ममता का नेतृत्व स्वीकारने को तैयार नहीं है। ऐसे में किसी मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर ममता के नेतृत्व में एकजुटता बनेगी इसमें संदेह है। वैसे नोटबंदी के विरोध में ममता ने राष्ट्र व्यापी आंदोलन छोडऩे की घोषणा की है। उन्होंने लखनऊ, पंजाब और बिहार में सभा करने का एलान किया है। उनके निर्देश पर तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता झारखंड, त्रिपुरा, ओडि़शा और असम में भी विरोध सभा करेंगे। अब देखना है कि राष्ट्रीय राजनीति में ममता क्या भूमिका निभाती हैं और उन्हें कहां तक इसका समर्थन मिलता है।

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